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कोयले से कैसे बनेगा LPG, पेट्रोल-डीजल? क्या प्रॉसेस, इससे गाड़ियों को फायदा या घाटा, अब फैसला क्यों?

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यहाँ इस पूरी प्रक्रिया, इसके फायदे और चुनौतियों का विस्तृत विश्लेषण दिया गया है:


1. प्रक्रिया: कोयले से ईंधन कैसे बनता है?

कोयले को सीधे तरल में नहीं बदला जा सकता; इसके लिए जटिल रासायनिक प्रक्रियाओं का सहारा लिया जाता है। इसके मुख्य रूप से दो तरीके हैं:

क. अप्रत्यक्ष द्रवीकरण (Indirect Liquefaction)

यह सबसे प्रचलित तरीका है, जिसे Fischer-Tropsch (FT) प्रोसेस कहा जाता है:

  1. गैसीकरण (Gasification): सबसे पहले कोयले को उच्च ताप और दबाव पर ऑक्सीजन और भाप के साथ गर्म किया जाता है। इससे कोयला ठोस से गैस में बदल जाता है, जिसे सिनगैस (Syngas) कहते हैं। यह मुख्य रूप से हाइड्रोजन ($H_2$) और कार्बन मोनोऑक्साइड ($CO$) का मिश्रण होती है।

  2. सफाई: इस गैस से सल्फर और अन्य अशुद्धियों को निकाला जाता है।

  3. FT सिंथेसिस: शुद्ध सिनगैस को उत्प्रेरक (Catalyst) की मौजूदगी में रासायनिक रूप से जोड़ा जाता है, जिससे हाइड्रोकार्बन की लंबी श्रृंखलाएं बनती हैं। इसी से डीजल, पेट्रोल और मोम प्राप्त होता है।

ख. प्रत्यक्ष द्रवीकरण (Direct Liquefaction)

इसमें कोयले को सीधे एक विलायक (Solvent) के साथ मिलाकर उच्च दबाव और तापमान पर हाइड्रोजन के साथ प्रक्रिया कराई जाती है। यह सीधे कच्चे तेल जैसा तरल बना देता है, जिसे बाद में रिफाइन किया जाता है।


2. गाड़ियों को फायदा या घाटा?

फायदे:

  • उच्च गुणवत्ता: CTL से बना डीजल 'सल्फर-मुक्त' होता है, जो इंजन के लिए अच्छा है और इससे प्रदूषण (सल्फर डाइऑक्साइड) कम होता है।

  • परफॉरमेंस: इस ईंधन का सीटेन नंबर (Cetane number) अधिक होता है, जिससे इंजन का दहन (Combustion) बेहतर होता है और माइलेज में मामूली सुधार हो सकता है।

घाटे/चुनौतियां:

  • इंजन एडजस्टमेंट: हालांकि यह 'ड्रॉप-इन' ईंधन है (यानी बिना बदलाव के इस्तेमाल हो सकता है), लेकिन लंबे समय में इसके अलग रासायनिक घनत्व के कारण पुराने इंजन के सील और रबर पार्ट्स पर असर पड़ सकता है।

  • कीमत: अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बहुत कम हो जाएं, तो कोयले से तेल बनाना महंगा पड़ सकता है।


3. अब यह फैसला क्यों लिया गया?

भारत ने इस दिशा में कदम उठाने के पीछे कई रणनीतिक कारण हैं:

  • ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security): भारत अपनी जरूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे हालातों में सप्लाई चेन बिगड़ने का डर रहता है। कोयला आधारित ईंधन आत्मनिर्भरता की ओर एक बड़ा कदम है।

  • विदेशी मुद्रा की बचत: कच्चे तेल के आयात पर भारत अरबों डॉलर खर्च करता है। स्वदेशी कोयले का उपयोग कर इस खर्च को कम किया जा सकता है।

  • कोयले का विशाल भंडार: भारत के पास दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा कोयला भंडार है। जैसे-जैसे दुनिया रिन्यूएबल एनर्जी की तरफ बढ़ रही है, कोयले का उपयोग बिजली बनाने के बजाय मूल्यवान रसायनों और ईंधन बनाने में करना एक स्मार्ट विकल्प है।

  • LPG की बढ़ती मांग: 'उज्ज्वला योजना' के बाद देश में LPG की खपत बढ़ी है। कोयले से सिंथेटिक LPG बनाकर ग्रामीण क्षेत्रों में आपूर्ति आसान की जा सकती है।


4. पर्यावरण का पहलू (सबसे बड़ी चुनौती)

कोयले से तेल बनाने की प्रक्रिया में CO2 (कार्बन डाइऑक्साइड) का उत्सर्जन बहुत अधिक होता है। इसलिए, सरकार इसके साथ Carbon Capture and Storage (CCS) तकनीक जोड़ने पर विचार कर रही है, ताकि इसे पर्यावरण के अनुकूल बनाया जा सके।

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