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भारत दलाल देश नहीं बन सकता S. Jaishankar का सख्त संदेश

विदेश मंत्री S. Jaishankar ने स्पष्ट कहा कि भारत वैश्विक राजनीति में “दलाल” (मध्यस्थ) की भूमिका नहीं निभा सकता। यह बयान पश्चिम एशिया संकट के बीच आया, जब पाकिस्तान द्वारा अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की कोशिशों पर चर्चा हो रही है।

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पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत ने अपनी कूटनीतिक स्थिति साफ कर दी है। एक सर्वदलीय बैठक में विदेश मंत्री S. Jaishankar ने कहा कि भारत किसी भी स्थिति में “दलाल देश” की भूमिका नहीं निभाएगा। उनका यह बयान उस समय आया जब विपक्ष ने अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान की मध्यस्थता को लेकर सवाल उठाए।

सरकार ने विपक्ष को जवाब देते हुए कहा कि पाकिस्तान का इस तरह का रोल नया नहीं है। 1981 से ही अमेरिका, इस्लामाबाद के जरिए तेहरान से संपर्क बनाए रखता आया है। जयशंकर ने भी इस बात पर जोर दिया कि ऐसी मध्यस्थता में “कुछ भी नया नहीं” है।

इस बैठक में रक्षा मंत्री Rajnath Singh की अध्यक्षता में कई बड़े नेता शामिल हुए, जिनमें गृह मंत्री Amit Shah और वित्त मंत्री Nirmala Sitharaman भी मौजूद थे।


पाकिस्तान की सक्रियता और अंतरराष्ट्रीय भूमिका

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif ने हाल ही में कहा कि उनका देश अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत कराने के लिए तैयार है। उन्होंने यहां तक प्रस्ताव दिया कि पाकिस्तान इन वार्ताओं की मेजबानी भी कर सकता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने भी इस दिशा में सकारात्मक संकेत दिए। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका ने ईरान को कुछ प्रस्ताव पाकिस्तान के जरिए भेजे हैं। हालांकि, ईरान ने सार्वजनिक रूप से इन वार्ताओं से इनकार किया है और कड़ा रुख अपनाया हुआ है।


भारत का रुख: संतुलन और प्राथमिकताएं

भारत सरकार ने स्पष्ट किया कि उसका मुख्य फोकस दो चीजों पर है:

  • खाड़ी देशों में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा

  • ऊर्जा आपूर्ति को बनाए रखना

प्रधानमंत्री Narendra Modi ने भी Donald Trump से बातचीत में कहा कि यह युद्ध जल्द खत्म होना चाहिए क्योंकि इसका असर सभी देशों पर पड़ रहा है।


विपक्ष का हमला

विपक्षी दलों ने सरकार की प्रतिक्रिया को “अपर्याप्त” बताया। कांग्रेस नेता तारिक अनवर ने आरोप लगाया कि जहां पाकिस्तान सक्रिय रूप से मध्यस्थता कर रहा है, वहीं भारत “मूक दर्शक” बना हुआ है। उन्होंने संसद में इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा की मांग की।


निष्कर्ष

इस पूरे घटनाक्रम से भारत की कूटनीतिक नीति साफ झलकती है—देश खुद को एक स्वतंत्र और संतुलित शक्ति के रूप में देखता है, न कि किसी तीसरे पक्ष के लिए मध्यस्थ या “दलाल” के रूप में। पश्चिम एशिया का संकट भले ही जटिल हो, लेकिन भारत अपने राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक संतुलन को प्राथमिकता दे रहा है।