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अमेरिका-ईरान शांति समझौते पर हस्ताक्षर, अब शुरू हुई असली परीक्षा: अगले 60 दिनों में किन 5 बातों पर रहेगी दुनिया की नजर?

अमेरिका और ईरान के बीच बहुप्रतीक्षित शांति समझौते पर हस्ताक्षर हो चुके हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि असली चुनौती अब शुरू हुई है। अगले 60 दिन तय करेंगे कि यह समझौता स्थायी शांति का आधार बनेगा या फिर क्षेत्र एक बार फिर तनाव की ओर लौटेगा।

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मध्य पूर्व में महीनों से जारी तनाव और संघर्ष के बाद अमेरिका और ईरान के बीच एक महत्वपूर्ण शांति समझौते पर हस्ताक्षर हो गए हैं। 14 बिंदुओं वाले इस प्रारंभिक समझौते का उद्देश्य सैन्य टकराव को रोकना, समुद्री व्यापार को बहाल करना और परमाणु मुद्दे पर आगे की बातचीत का रास्ता खोलना है। हालांकि यह समझौता अंतिम समाधान नहीं है, बल्कि अगले 60 दिनों तक चलने वाली एक जटिल वार्ता प्रक्रिया की शुरुआत माना जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि समझौते पर हस्ताक्षर करना अपेक्षाकृत आसान हिस्सा था, जबकि उसे लागू करना कहीं अधिक कठिन साबित हो सकता है। आने वाले दो महीने इस बात का फैसला करेंगे कि क्या दोनों देश दशकों पुराने अविश्वास को पीछे छोड़ पाएंगे या नहीं। आइए जानते हैं वे पांच बड़े मुद्दे जिन पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी।

1. परमाणु कार्यक्रम पर क्या बनेगी सहमति?

समझौते का सबसे संवेदनशील और जटिल हिस्सा ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ा है। प्रारंभिक दस्तावेज में दोनों पक्षों ने इस मुद्दे को सुलझाने के लिए आगे बातचीत जारी रखने पर सहमति जताई है। ईरान ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी में कुछ कदम उठाने की बात कही है, लेकिन परमाणु गतिविधियों की अंतिम सीमा और नियंत्रण अभी तय नहीं हुआ है।

2. क्या वास्तव में खुल पाएगा होर्मुज़ जलडमरूमध्य?

दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद अहम है। समझौते में इस मार्ग को सुरक्षित और सुचारु रूप से खोलने का प्रावधान शामिल है। यदि इस पर अमल होता है तो ऊर्जा बाजारों को राहत मिल सकती है, लेकिन किसी भी प्रकार की बाधा या विवाद से तेल की कीमतों में फिर उछाल आ सकता है।

3. प्रतिबंधों में राहत और आर्थिक पैकेज

समझौते के तहत ईरान को चरणबद्ध तरीके से आर्थिक राहत देने और प्रतिबंधों में ढील देने की बात कही गई है। रिपोर्टों के अनुसार, ईरान की आर्थिक पुनर्बहाली के लिए बड़े वित्तीय पैकेज और तेल निर्यात को फिर से गति देने पर भी विचार किया जा रहा है। हालांकि आलोचकों का कहना है कि प्रतिबंधों में जल्दबाजी में राहत देने से समझौते के पालन को सुनिश्चित करना कठिन हो सकता है।

4. क्षेत्रीय सहयोगी क्या करेंगे?

समझौते की सफलता केवल अमेरिका और ईरान पर निर्भर नहीं है। इजरायल, लेबनान, खाड़ी देशों और अन्य क्षेत्रीय ताकतों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। कुछ सहयोगी देशों ने समझौते के कुछ प्रावधानों पर चिंता जताई है। यदि क्षेत्रीय स्तर पर विरोध या असहमति बढ़ती है तो वार्ता प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

5. क्या 60 दिन बाद स्थायी समझौता संभव होगा?

वर्तमान दस्तावेज को अंतरिम व्यवस्था माना जा रहा है। अगले 60 दिनों में तकनीकी वार्ताएं, निरीक्षण व्यवस्था, सुरक्षा गारंटी और आर्थिक प्रतिबद्धताओं जैसे मुद्दों पर विस्तृत बातचीत होगी। यदि दोनों पक्ष सहमति तक पहुंचते हैं, तो इसे संयुक्त राष्ट्र के समर्थन वाले व्यापक समझौते का रूप दिया जा सकता है।

विश्लेषकों का मानना है कि यह समझौता मध्य पूर्व में स्थिरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है, लेकिन इसकी सफलता कई अनिश्चित कारकों पर निर्भर करेगी। दशकों की दुश्मनी, राजनीतिक दबाव और क्षेत्रीय हितों के बीच अगले 60 दिन अमेरिका और ईरान दोनों के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं।

फिलहाल दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह समझौता इतिहास बदलने वाला साबित होगा या फिर यह भी उन कई प्रयासों की तरह अधूरा रह जाएगा जो अतीत में स्थायी शांति स्थापित करने में सफल नहीं हो सके।

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