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क्या क्वाड सिर्फ चीन को घेरने का मंच है? ट्रंप की वापसी ने बदला रणनीतिक समीकरण

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी की संभावना ने क्वाड (Quad) समूह की भविष्य की दिशा को लेकर नई बहस छेड़ दी है। भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के इस रणनीतिक मंच को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह केवल चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने का माध्यम है या इससे कहीं व्यापक उद्देश्य रखता है।

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हिंद-प्रशांत क्षेत्र की बदलती भू-राजनीति के बीच क्वाड (Quadrilateral Security Dialogue) एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में है। भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के इस समूह को लंबे समय से क्षेत्रीय स्थिरता और सहयोग के महत्वपूर्ण मंच के रूप में देखा जाता रहा है। हालांकि अमेरिका की राजनीति में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी की संभावना ने क्वाड की भूमिका और भविष्य को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है।

क्वाड की स्थापना का मूल उद्देश्य हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा देना, समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का समर्थन करना रहा है। लेकिन समय के साथ इसे चीन के बढ़ते सैन्य, आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव के जवाब के रूप में भी देखा जाने लगा। यही वजह है कि कई विश्लेषक इसे एक प्रकार के संतुलनकारी गठजोड़ के रूप में वर्णित करते हैं।

ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान अमेरिका ने चीन के प्रति अपेक्षाकृत कड़ा रुख अपनाया था। व्यापार युद्ध से लेकर तकनीकी प्रतिस्पर्धा और सुरक्षा मामलों तक, वाशिंगटन और बीजिंग के संबंधों में तनाव लगातार बढ़ता गया। ऐसे में क्वाड को भी नई गति मिली और सदस्य देशों के बीच रणनीतिक सहयोग मजबूत हुआ।

हालांकि ट्रंप की संभावित वापसी को लेकर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। कुछ का मानना है कि उनकी "अमेरिका फर्स्ट" नीति के कारण अमेरिका अपने सहयोगियों से अधिक जिम्मेदारी उठाने की अपेक्षा कर सकता है। इससे क्वाड के भीतर नई प्राथमिकताएं उभर सकती हैं। वहीं कुछ विश्लेषकों का मानना है कि चीन को लेकर अमेरिकी नीति में मूलभूत बदलाव की संभावना कम है, इसलिए क्वाड की रणनीतिक प्रासंगिकता बनी रहेगी।

भारत के लिए क्वाड केवल सुरक्षा सहयोग तक सीमित नहीं है। नई दिल्ली इसे तकनीक, आपूर्ति श्रृंखला, समुद्री व्यापार, साइबर सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में सहयोग के अवसर के रूप में भी देखती है। भारत लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि क्वाड किसी सैन्य गठबंधन की तरह काम नहीं करता और इसका उद्देश्य किसी एक देश को निशाना बनाना नहीं है।

जापान और ऑस्ट्रेलिया भी इस मंच को क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं। दोनों देशों का मानना है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्वतंत्र और खुली समुद्री व्यवस्था वैश्विक व्यापार और आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है। इसी कारण क्वाड की बैठकों में सुरक्षा के अलावा आर्थिक और तकनीकी सहयोग पर भी जोर दिया जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, ट्रंप की वापसी से क्वाड की कार्यशैली में कुछ बदलाव जरूर आ सकते हैं, लेकिन इसकी मूल उपयोगिता समाप्त होने की संभावना नहीं है। चीन के बढ़ते प्रभाव, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं की सुरक्षा और क्षेत्रीय संतुलन जैसे मुद्दे आने वाले वर्षों में भी प्रमुख बने रहेंगे। ऐसे में क्वाड सदस्य देशों के लिए एक महत्वपूर्ण समन्वय मंच बना रह सकता है।

इसके साथ ही यह भी स्पष्ट है कि क्वाड की सफलता केवल चीन से जुड़े मुद्दों पर निर्भर नहीं करेगी। यदि यह समूह आर्थिक सहयोग, तकनीकी नवाचार, बुनियादी ढांचा विकास और क्षेत्रीय साझेदारी को आगे बढ़ाने में सफल रहता है, तो इसकी भूमिका और भी व्यापक हो सकती है।

फिलहाल वैश्विक राजनीति में तेजी से बदलते घटनाक्रमों के बीच क्वाड का भविष्य कई कारकों पर निर्भर करता है। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि ट्रंप की संभावित वापसी ने इस रणनीतिक मंच को लेकर नई चर्चाओं और संभावित बदलावों के लिए रास्ता जरूर खोल दिया है।

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